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Thursday, August 13, 2026

सिंधु जल संधि पर भारत का स्पष्ट रुख, पुराने स्वरूप में बहाल नहीं होगी व्यवस्था

नई दिल्ली। पाकिस्तान की ओर से सिंधु जल संधि को लेकर मध्यस्थता की कोशिशों के बीच भारत ने दो टूक कहा है कि वर्ष 1960 की सिंधु जल संधि अपने पुराने स्वरूप में दोबारा लागू नहीं होगी। भारत का कहना है कि मौजूदा परिस्थितियों में यह व्यवस्था देश के हित में नहीं है।

आतंकवाद ने तोड़ा विश्वास का आधार

सरकार की नीति से जुड़े सूत्रों के अनुसार, भारत ने यह संधि सद्भावना और मैत्री की भावना से की थी, लेकिन पाकिस्तान ने दशकों तक सीमा पार आतंकवाद को बढ़ावा देकर संधि की मूल भावना को ही खत्म कर दिया। संसद, मुंबई, उरी, पुलवामा और पहलगाम जैसे आतंकी हमलों का उल्लेख करते हुए भारत ने कहा कि आपसी विश्वास और सहयोग का आधार पूरी तरह समाप्त हो चुका है।

भारत ने पहलगाम आतंकी हमले के बाद वर्ष 2025 में सिंधु जल संधि को निलंबित कर दिया था। सूत्रों का कहना है कि अब 2025 से पहले की व्यवस्था में लौटना संभव नहीं है।

नई परिस्थितियों के अनुसार होगा भविष्य का समझौता

भारत का कहना है कि यदि भविष्य में कोई नई व्यवस्था या समझौता होता है तो उसमें जलवायु परिवर्तन, ग्लेशियरों का पिघलना, बढ़ती जल मांग, नई तकनीक, जल संसाधन प्रबंधन और सुरक्षा संबंधी चुनौतियों को शामिल किया जाएगा। साथ ही पाकिस्तान को सीमा पार आतंकवाद पर विश्वसनीय और ठोस कदम उठाने होंगे।

संधि से जुड़े संस्थागत तंत्र फिलहाल निष्क्रिय

सूत्रों ने बताया कि संधि के निलंबन के बाद स्थायी सिंधु आयोग की बैठकें, निरीक्षण, दौरे, आंकड़ों का नियमित आदान-प्रदान और विवाद समाधान से जुड़े अधिकांश संस्थागत तंत्र फिलहाल निष्क्रिय हैं। हालांकि बाढ़ संबंधी आवश्यक सूचनाएं पहले की तरह इस्लामाबाद स्थित भारतीय उच्चायोग के माध्यम से साझा की जाती रहेंगी।

जलविद्युत परियोजनाओं पर तेजी से काम

भारत ने स्पष्ट किया कि वह सिंधु नदी प्रणाली के अपने हिस्से के जल का पूरा उपयोग करने की दिशा में आगे बढ़ रहा है। इस वर्ष 624 मेगावाट कीरू और 1000 मेगावाट पाकल दुल जलविद्युत परियोजनाएं शुरू होने की उम्मीद है। इसके अलावा जम्मू-कश्मीर में आने वाले वर्षों में 5500 मेगावाट अतिरिक्त क्षमता विकसित करने की योजना पर भी काम जारी है।

भारत का आरोप है कि पाकिस्तान ने वर्षों से बगलीहार, किशनगंगा, रातले, पाकल दुल, तुलबुल और अन्य परियोजनाओं पर लगातार आपत्तियां उठाकर विकास कार्यों में बाधा पहुंचाई। साथ ही विवाद समाधान की प्रक्रिया का उपयोग तकनीकी मामलों को अनावश्यक रूप से लंबा खींचने के लिए किया।

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